«जाने का नहीं सोचता»: रेमिटेंस की मजबूरी में फंसे खाड़ी के अफ्रीकी प्रवासी
“No pienso en marcharme”: la necesidad de seguir enviando remesas atrapa a los migrantes africanos en el Golfo
सारांश
खाड़ी देशों में लगभग पचास लाख अफ्रीकी मजदूर निर्माण, आतिथ्य और घरेलू सेवाओं में काम करते हैं और अपने परिवारों को रेमिटेंस भेजने पर निर्भर हैं। तेल राजस्व की अस्थिरता से उनकी नौकरियां खतरे में हैं, फिर भी अधिकांश का कहना है कि वे वापस लौटने का खर्च नहीं उठा सकते। वैश्विक तेल कीमतों में उतार-चढ़ाव उनकी कमज़ोर स्थिति को और गहरा कर रहा है।
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